विवेकी राय की व्यक्तित्व एवं कृतित्व का अध्ययन
Author : डाॅ. स्नेहलता निर्मलकर और पवन कुमार पाण्डेय
Abstract :
किसी भी साहित्यकार का व्यक्तित्व उसकी रचनाओं में स्वाभाविक रूप से परिलक्षित होता है, किंतु निबंध विधा में तो लेखक के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति सर्वत्र स्पष्ट दिखाई देती है। विशेषतः ललित निबंध में निबंधकार का व्यक्तित्व ही उसका प्राणतत्त्व होता है। यहाँ व्यक्तित्व से अभिप्राय उस विशिष्ट रचनात्मक सत्ता से है जिसमें रागात्मकता, सरसता, पांडित्य, विनोदप्रियता और प्रकृति प्रेम जैसी प्रवृत्तियाँ विद्यमान रहती हैं। इन्हीं गुणों के कारण ललित निबंधों में लालित्य, भावुकता, रोचकता और सहज सरसता का संचार होता है। निबंधों में व्यक्तित्व के प्रतिबिंबन को रेखांकित करते हुए बाबू गुलाब राय का मत है कि- “निबंध में व्यक्तित्व छिपाया नहीं जा सकता। लेखक जो कुछ लिखता है उसको अपने निजी दृष्टिकोण से लिखता है, उसके पीछे उसके निजी अनुभवों की प्रेरणा दिखाई देती है।” अर्थात निबंधकार अपनी अनुभूतियों और दृष्टिकोण से ही जीवन को अभिव्यक्त करता है। इन्हीं निजी अनुभवों को लोकजीवन और लोकसंस्कृति से जोड़कर जिन लेखकों ने अपने निबंधों को भावपूर्ण और वैचारिक रूप से प्रखर बनाया है, उनमें डॉ. विवेकी राय का स्थान विशेष है। डॉ. वेद प्रकाश अमिताभ ने उनके संबंध में उचित ही लिखा है कि- “श्री विवेकी राय के ललित निबंधों का विन्यास उनका अपना है और वे भेड़चाल का अंग न होकर रचनाकार के अपने अनुभवों से अनुस्यूत रचनाकर्म हैं।
Keywords :
रागात्मकता, लोकसंस्कृति, प्रकृति, लोकजीवन।