भारतीय परम्परा में नैतिक निर्देशन के स्रोतों का दार्शनिक विश्लेषण
Author : रामानन्द कुलदीप
Abstract :
भारतीय नैतिक चिन्तन में धर्म के ज्ञान की समस्या मूलतः एक ज्ञानमीमांसीय समस्या है—धर्म क्या है, यह किस प्रमाण से जाना जाए और विरोध की स्थिति में किस निर्देश को वरीयता दी जाए। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति तथा गौतम, आपस्तम्ब, बौधायन एवं वसिष्ठ के धर्मसूत्रों ने इस प्रश्न का उत्तर चतुर्विध धर्म-मूल के सिद्धान्त द्वारा दिया है—वेद (श्रुति), स्मृति, सदाचार (शिष्टाचार) और आत्मतुष्टि (स्वस्य प्रियमात्मनः)। प्रस्तुत शोध आलेख इन चारों स्रोतों का मूल ग्रन्थों, पूर्वमीमांसा की प्रमाण-मीमांसा तथा मेधातिथि, कुल्लूक और विज्ञानेश्वर जैसे टीकाकारों के आलोक में दार्शनिक विश्लेषण करता है। आलेख का प्रतिपाद्य यह है कि यह चतुर्विध व्यवस्था एक श्रेणीबद्ध किन्तु अन्तःसम्बद्ध ज्ञानमीमांसीय संरचना है, जिसमें नैतिक प्रामाण्य अपौरुषेय शब्द से प्रारम्भ होकर परम्परा और आदर्श आचरण से होता हुआ विवेकशील अन्तःकरण तक पहुँचता है। कान्ट के स्वायत्तता-परतन्त्रता विमर्श, अरस्तू के प्रज्ञावान् पुरुष (फ्रोनिमोस) तथा बटलर के अन्तःकरण-सिद्धान्त से तुलना करते हुए आलेख यह स्थापित करता है कि भारतीय परम्परा न तो शुद्ध परतन्त्र नीतिशास्त्र है और न ही निरपेक्ष व्यक्तिनिष्ठ नीतिशास्त्र, बल्कि यह शास्त्र, परम्परा और अन्तःकरण के बीच एक संतुलित संवाद की प्रस्तावना करती है I
Keywords :
धर्म, धर्ममूल, श्रुति, स्मृति, सदाचार, शिष्टाचार, आत्मतुष्टि, स्वतःप्रामाण्य, पूर्वमीमांसा, धर्मशास्त्र, धर्मसूत्र, नैतिक ज्ञानमीमांसा I