गीतांजलि चटर्जी के ‘तीसरे लोग’ में स्त्री-अस्मिता और सामाजिक संरचना
Author : डॉ. गीता संतोष यादव
Abstract :
समकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता का प्रश्न बहुआयामी स्वरूप ग्रहण कर चुका है। अब स्त्री-विमर्श केवल स्त्री पर होने वाले प्रत्यक्ष शोषण या लैंगिक भेदभाव की चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि स्त्री के सामाजिक अस्तित्व, आत्मनिर्णय, पहचान, स्वतंत्रता, पारिवारिक संबंधों, आर्थिक स्थिति और सामाजिक स्वीकृति जैसे प्रश्नों को भी अपने केंद्र में रखता है। इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में गीतांजलि चटर्जी का उपन्यास ‘तीसरे लोग’ स्त्री के जीवनानुभवों और सामाजिक संरचना के अंतर्संबंध को समझने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कृति के रूप में देखा जा सकता है।उपन्यास में स्त्री की स्थिति को केवल व्यक्तिगत अनुभव के स्तर पर नहीं, बल्कि उन सामाजिक और सांस्कृतिक संरचनाओं के संदर्भ में समझने का अवसर मिलता है, जो उसके व्यक्तित्व और जीवन-निर्णयों को प्रभावित करती हैं। परिवार, सामाजिक मर्यादा, लैंगिक भूमिकाएँ, संबंधों की अपेक्षाएँ और सामाजिक स्वीकृति जैसे तत्व स्त्री-अस्मिता के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्त्री जब इन निर्धारित भूमिकाओं से आगे जाकर अपने अस्तित्व और अधिकारों को पहचानने का प्रयास करती है, तब उसके सामने सामाजिक संरचना के साथ टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है।‘तीसरे लोग’ का शीर्षक भी सामाजिक मुख्यधारा और उसके हाशिये के बीच स्थित जीवन की ओर संकेत करता है। इस संदर्भ में स्त्री-अस्मिता का प्रश्न और अधिक जटिल हो जाता है, क्योंकि स्त्री की सामाजिक पहचान अनेक स्तरों पर निर्मित और नियंत्रित होती है। प्रस्तुत आलेख में उपन्यास के संदर्भ में स्त्री-अस्मिता, सामाजिक संरचना, पितृसत्ता, पारिवारिक व्यवस्था, आत्मनिर्णय, हाशियाकरण और स्त्री-प्रतिरोध के प्रश्नों का विश्लेषण किया गया है I
Keywords :
स्त्री-अस्मिता, स्त्री-विमर्श, सामाजिक संरचना, पितृसत्ता, स्त्री चेतना, आत्मनिर्णय, हाशियाकरण, सामाजिक यथार्थ I