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ऋत, सत्य और धर्म के अंतर्संबंध का भारतीय दार्शनिक परम्परा में तात्विक अध्ययन और विश्लेषण

Author : रामानन्द कुलदीप

Abstract :

भारतीय दार्शनिक परम्परा में ऋत, सत्य एवं धर्म — ये तीन अवधारणाएँ परस्पर इतनी सघनता से गुँथी हुई हैं कि इन्हें पृथक्-पृथक् समझना अपूर्ण ही रहता है। प्रस्तुत शोध आलेख का उद्देश्य इन तीनों अवधारणाओं के तात्विक अंतर्संबंध का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करना है। तर्क दिया गया है कि ऋत सृष्टि की सार्वभौमिक व्यवस्था का सत्तामूलक (ontological) आयाम है, सत्य उसी व्यवस्था का ज्ञानमूलक-वाचिक (epistemic-verbal) प्रकटीकरण है, तथा धर्म उसका आचरणमूलक-व्यावहारिक (ethical-practical) कार्यान्वयन है — अर्थात् ये तीनों एक ही मूल तत्व के तीन पारस्परिक सम्बद्ध आयाम हैं, न कि तीन स्वतंत्र सिद्धांत। ऐतिहासिक दृष्टि से यह भी प्रदर्शित किया गया है कि उत्तर वैदिक एवं उपनिषद-काल में जैसे-जैसे ‘ऋत’ शब्द का प्रयोग क्षीण होता गया, वैसे-वैसे सत्य एवं धर्म ने उसके अर्थ-क्षेत्र को क्रमशः आत्मसात् कर लिया — सत्य ने उसके सत्यापन-मूलक आयाम को, तथा धर्म ने उसके आचार-मूलक आयाम को। आलेख के अंत में इस त्रयी की समकालीन प्रासंगिकता, विशेषतः भारत के राष्ट्रीय आदर्श-वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ के दार्शनिक निहितार्थ पर भी विचार किया गया है I

Keywords :

ऋत, सत्य, धर्म, वैदिक दर्शन, उपनिषद, तात्विकता, सत्यमेव जयते I