उपनिषदीय विद्या और अविद्या की शैक्षिक अवधारणा
Author : प्रिया त्रिपाठी और डॉ. नन्दलाल मिश्रा
Abstract :
'विद्या' और 'अविद्या' की अवधारणाएँ भारतीय शिक्षा-दर्शन की मूलाधार हैं। सामान्यतः विद्या को ज्ञान और अविद्या को अज्ञान समझ लिया जाता है, किंतु वास्तव में इन दोनों की व्याख्या अत्यंत व्यापक एवं गहन है। ईशावास्य उपनिषद के अनुसार विद्या और अविद्या दोनों का समन्वित ज्ञान ही मनुष्य को पूर्णता की ओर अग्रसर करता है। यहाँ अविद्या का अर्थ केवल अज्ञानता नहीं, बल्कि लौकिक, व्यवहारिक, वं भौतिक पदार्थों के आसक्ति से है, जबकि विद्या का अभिप्राय आत्मविद्या, ब्रह्मविद्या तथा परम चेतना की अवस्था के प्रतिनिधित्व से है।
वर्तमान कालीन शिक्षा व्यवस्था मुख्यतः रोजगार, प्रतिस्पर्धा, आर्थिक उन्नति तथा तकनीकी दक्षता पर केंद्रित है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति की तकनीकी क्षमता का विकास तो हो रहा है, किंतु आत्मचेतना आत्मसंयम नैतिकता, सह-अस्तित्व, करुणा जैसे मानवीय मूल्यों का अपेक्षित विकास नहीं हो पा रहा है। विद्या व अविद्या दोनों के विभेद को व्यापकता से समझने पर ही इनके असंतुलन को दूर किया जा सकता है; विद्या और अविद्या के विभेद का अंतर ही शैक्षिक दर्शन कहलाता है इसमें शिक्षा को केवल सूचना या कौशल का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मानुशासन, विवेक, चरित्र-निर्माण तथा आत्मसाक्षात्कार की प्रक्रिया माना गया है।
प्रस्तुत शोध-पत्र में विद्या एवं अविद्या की उपनिषदों में प्रतिपादित अवधारणाओं का शैक्षिक विश्लेषण किया गया है। इसमें विद्या के अंतर्गत मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार एवं चेतना की भूमिका, अविद्या के अंतर्गत लौकिक एवं भौतिक शिक्षा की आवश्यकता, कठोपनिषद में वर्णित श्रेय एवं प्रेय की अवधारणा, आधुनिक शिक्षा की चुनौतियाँ तथा मानव जीवन के परम लक्ष्य के संदर्भ में शिक्षा की भूमिका का विशद विवेचन किया गया है। शोध का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि यदि आधुनिक शिक्षा प्रणाली में विद्या-अविद्या की समन्वित अवधारणा को समाविष्ट किया जाए, तो शिक्षा अधिक मानवीय, मूल्यपरक, समग्र एवं जीवनोपयोगी बन सकती है I
Keywords :
विद्या, अविद्या, उपनिषद, भारतीय ज्ञान परंपरा, शिक्षा-दर्शन, ब्रह्मविद्या, आत्मविद्या, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, चेतना, श्रेय, प्रेय, समग्र शिक्षा, मूल्यपरक शिक्षा I