मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास ‘त्रिया हठ’ में निहित लोकजीवन और लोकसंस्कृति
Author : डॉ. गीता संतोष यादव
Abstract :
मैत्रेयी पुष्पा हिन्दी साहित्य जगत की एक ऐसी रचनाकार हैं जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से भारतीय ग्रामीण स्त्री के जीवन संघर्षों को अभूतपूर्व गहराई और संवेदना के साथ प्रस्तुत किया है I उनका लेखन स्वातंत्र्योतर भारत के सामजिक परिवेश को, विशेषकर पुरूष-प्रधान व्यवस्था में स्त्रियों की दयनीय स्थिति और प्रतिरोध के बदलते स्वरूपों को अत्यंत सजीवता से चित्रण करता है I सन्२००६ में प्रकाशित उनका उपन्यास त्रिया हठ इसी परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो ग्रामीण स्त्री की मुखरता, उसके अस्तित्व संघर्ष और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के प्रति उसके ‘हठ’ के केंद्र में रखता है I
इस शोध-प्रपत्र का उद्देश त्रिया हठ के विषय-वस्तु, चरित्र-चित्रण, नारी चेतना, भाषा-शैली और उसके सामाजिक-सांस्कृतिक निहितार्थों का बहुयामी विश्लेषण करना है I उपन्यास के भीतरी स्त्री-शरीर, यौनिकता, वर्ग-जाति के प्रश्न और पितृसत्तात्मक के प्रति प्रतिरोध के विविध रूप इस अध्ययन के केंदीय बिंदु होंगे I
Keywords :
'त्रिया हठ', ‘मैत्रेयी पुष्पा’, 'संकल्प', 'सती', 'देवी', 'पतिव्रता' I