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किराताजुर्नीयम महाकाव्य के प्रथम सर्ग में राज-व्यवस्थाः एक अध्ययन

Author : डॉ. अनुसुया उपाध्याय

Abstract :

संस्कृत साहित्य के इतिहास में महाकवि भारवि का महत्वपूर्ण स्थान है। भारवि का स्थितिकाल 634 ई. से पूर्व माना जाता है। भारवि का सुप्रसिद्ध महाकाव्य ‘किरातार्जुनीयम्’ है। इसका कथानक महाभारत के ‘वन-पर्व’ से लिया गया है। इसमें 18 सर्ग है। धूतक्रीडा में पराजित होने के पश्चात पाण्डव द्वेतवन में रहने लगते है। युधिष्ठिर वनेचर को गुप्तचर के रूप में दुर्योधन की राजव्यवस्था एवं उसका प्रजा के प्रति व्यवहार जानने के लिए हस्तिनापुर भेजता है। वनेचर सम्पूर्ण वृतान्त अवगत करके यथावत् युधिष्ठिर के समक्ष प्रस्तुत करता है। द्रौपदी शत्रुओं की सफलता को सुनकर क्रोधित होती है। युधिष्ठिर को युद्ध करने हेतु उत्तेजित करती है। महर्षि वेदव्यास के परामर्श से अर्जुन इन्द्रकील पर्वत पर पाषुपत अस्त्र की प्राप्ति के लिए तपस्या करने जाता है। अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए शिव किरात का वेष धारण कर उससे युद्ध करते है और अन्त में उसके साहस से प्रसन्न होकर शिव अर्जुन को पाशुपत अस्त्र प्रदान करते है। इस कथा को भारवि ने अपने काव्य-कौशल से 18 सर्गो में चमत्कार पूर्ण रीति से निबद्ध किया। इस महाकाव्य की गणना ‘बृहत्त्रयी’ में की जाती है। इसका प्रधान रस वीर है। यह काव्य अपने अर्थ गौरव के लिए प्रसिद्ध है। भारवि अपने समय के राजनीति पण्डित एवं लोक व्यवहार के ज्ञाता थे। यह उनके काव्य में पदे-पदे द्रष्टित होता है।

Keywords :

राजनीति, प्रजा, वनेचर, आन्तरिक शत्रु, उपायचतुष्टय राजनेता, राजा।