हिन्दी ओर प्रवासी साहित्य की प्रांसगिकता
Author : डाॅ. मंजू भट्ट
Abstract :
हिन्दी साहित्य का स्वरूप समय के साथ निरंतर परिवर्तित होता रहा है। जैसे-जैसे समाज की संरचना बदली, वैसे-वैसे साहित्य की संवेदना, विषयवस्तु और दृष्टिकोण में भी परिवर्तन आया। आधुनिक युग में यह परिवर्तन सबसे अधिक प्रवासन की प्रक्रिया के कारण दृष्टिगोचर होता है। भारत से बाहर बसे हिंदीभाषी लेखकों द्वारा रचित साहित्य ने हिंदी साहित्य को एक नई दिशा और व्यापक वैश्विक फलक प्रदान किया है। यही साहित्य ‘‘प्रवासी हिन्दी साहित्य’’ के नाम से जाना जाता है। प्रवासी साहित्य केवल भौगोलिक विस्थापन की कथा नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक, मानसिक और भावनात्मक विस्थापन का भी साहित्य है। इसमें व्यक्ति की आंतरिक पीड़ा, स्मृतियाँ, अस्मिता बोध और सामार्ग हैं। इस प्रकार हिन्दी और प्रवासी सामाजिक संघर्ष गहराई से अभिव्यक्त होते जाती है। प्रवासी हिन्दी साहित्य वह साहित्य है जिसकी रचना भारत से बाहर बसे हिन्दी लेखकों द्वारा की गई प्रवासी साहित्य की प्रासंगिकता समकालीन वैश्विक संदर्भों में अत्यंत महत्वपूर्ण हो हो या जिसमें प्रवासी जीवन की अनुभूतियाँ केंद्रीय रूप में उपस्थित हों। इसका स्वरूप बहुस्तरीय है, क्योंकि इसमें दो संस्कृतियों, दो समाजों और दो जीवन-दृष्टियों का समन्वय देखने को मिलता है। प्रवासी लेखक एक ओर अपनी मातृभूमि की स्मृतियों से जुड़ा होता है, तो दूसरी ओर उसे नए देश की परिस्थितियों में स्वयं को ढालना पड़ता है। इस द्वंद्व से जो साहित्य जन्म लेता है, वह भावनात्मक रूप से अत्यंत गहन और विचारात्मक रूप से समृद्ध होता है। प्रवासी जीवन का सबसे जटिल पक्ष अस्मिता का संकट है। विदेशी भूमि पर व्यक्ति न तो पूरी तरह वहाँ का हो पाता है और न ही अपने देश का रह जाता है। यह द्वंद्व उसकी मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है। यह आत्मसंघर्ष प्रवासी साहित्य को गहराई और गंभीरता प्रदान करता है। यह साहित्य व्यक्ति के आंतरिक संघर्षों का सशक्त दस्तावेज़ बन जाता है।
Keywords :
वैश्वीकरण, प्रवासी, सांस्कृतिक, अस्मिता-बोध, आत्मसंघर्ष, अभिव्यक्त, दृष्टिकोण।