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कथक नृत्य शैली का छन्द

Author : डॉ. जितेश गड़पायले

Abstract :

यह लेख कथक नृत्य शैली में लय और ताल की अवधारणा और महत्व पर केंद्रित है, लेख में, ताल को भरतमुनि के अनुसार संगीत में आवृत्ति की निश्चित सीमा बद्धता कहा गया है, जबकि लय को दो क्रियाओं के बीच के समय या दूरी के रूप में परिभाषित किया गया है। लहरों के टकराने को सशब्द क्रिया और लौटकर जाने को निःशब्द क्रिया का उदाहरण देकर लय और ताल के प्राकृतिक संबंध को समझाया गया है। ये दोनों एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं।
लेख में विलम्बित, मध्य, और द्रुत तीन प्रकार की लय का उल्लेख है, जिसमें अतिविलम्बित लय को संभालना चुनौतीपूर्ण बताया गया है, जिसका चलन रायगढ़ घराने में होता आया है।
छन्द को एक पवित्र शक्ति माना गया है, और इसे लय के स्वरूप या भावों की विशिष्ट धारणा कहा गया है। राजा चक्रधर सिंह ने इसी व्याकरण को ध्यान में रखते हुए, अनेक अनोखे बोल बन्दिशों जैसे श्दल बादलश्, श्चमक बिजलीश्, और श्मेघावलीश् की रचना की। इन तालों के माध्यम से वे दर्शकध्सहृदय में भावों को जाग्रत करते थे।

Keywords :

समुद्र की लहरों में ठहराव होता और हर लहरों के आने-जाने में आकृति का उत्पन्न होना नाद को सूचित करता है।