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कथक नृत्य में योग का सौन्दर्य

Author : डॉ. जितेश गड़पायले

Abstract :

यह लेख कथक के नृत्त (शुद्ध नृत्य) पक्ष में योग और मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों के सौंदर्यशास्त्र के अंतर्निहित जुड़ाव की पड़ताल करता है। नृत्त को कथक की शुद्ध और मौलिक भाषा के रूप में वर्णित किया गया है, जो एक शाश्वत सौंदर्य को मूर्त रूप देता है जो नर्तक के शारीरिक रूप को अनंत से जोड़ता है।
प्रक्रिया श्थाटश् (ज्ींश्ज) नामक प्रारंभिक अनुक्रम से शुरू होती है, जो एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक एकाग्रता को आरंभ करती है। छाती के सामने रखी गई अराल मुद्रा को ध्यान की योग मुद्रा के रूप में पहचाना जाता है जो एकाग्रता में सहायता करती है। साथ ही, स्थिर दृष्टि त्राटक (ज्तंजंां) की तरह कार्य करती है, जिससे मस्तिष्क की पीनियल ग्रंथि (च्पदमंस ळसंदक) प्रभावित होती है। योग के अनुसार, यह ग्रंथि शरीर, मन और आत्मा का एकीकरण करती है।
ध्वनि और लय के साथ शारीरिक संचलन योग के तथ्यों को सहज रूप से शामिल करता है। कथक की सृजन प्रक्रिया का मूल शरीर, मन और बुद्धि के अनुशासित संरेखण में निहित है, जो अंततः स्वतंत्रता और रचनात्मक सौंदर्य की अभिव्यक्ति की ओर ले जाता है जो शारीरिक सीमाओं को पार करता है।

Keywords :

भाषा सौन्दर्य की बुनियादी आभा, सृजन का अनन्त आयाम रस का अखण्ड आनन्द, मुहावरे और समीकरण के माध्यम से शाश्वत मान्यता की स्थापना, सृजन के सूत्र का बंधना, वैविध्य रचना की पूर्णता