कथक नृत्य की प्रस्तुति में नृत्तांग का सौन्दर्य
Author : डॉ. जितेश गड़पायले
Abstract :
यह लेख कथक नृत्य की प्रस्तुति में नृत्तांग (शुद्ध नृत्य अंश) के सौन्दर्य पर प्रकाश डालता है। कथक नृत्य वर्तमान में विकास की चरम सीमा पर है, जिसमें प्राचीन काल से निरंतर नवीन प्रयोग होते रहे हैं। इसकी प्रस्तुति में वंदना, थाट, बोल-बंदिशें, गतभाव, तराना, तिरवट, चतुरंग आदि शामिल हैं। कथक को नाट्य के सिद्धांतों के प्रयोग के कारण नाट्यानुगामी नृत्य कह सकते हैं, जिसमें मुखाभिनय का बाहुल्य होता है।
प्रारंभ में थाट में एक ही स्थान पर खड़े होकर कसक, मसक, कटाक्ष और ग्रीवा संचालन जैसी क्रियाएँ होती थीं। बाद में रायगढ़ दरबार में पं. जयलाल महाराज द्वारा थाट में सरकने की क्रिया विधि का प्रचलन हुआ। कालांतर में थाट के नृत्तांग में सौन्दर्य वृद्धि के लिए छोटी-बड़ी तिहाइयों का प्रयोग होने लगा। बोल-बंदिशें कथक नृत्य का सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं, जिसमें सम्पूर्ण नृत्तांग निहित है।
पं. लच्छू महाराज और पं. बिरजू महाराज ने कथक के सौन्दर्य पक्ष को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पं. बिरजू महाराज की गिनती की तिहाइयाँ और उनमें भावों का समावेश बेहद लोकप्रिय हुआ। रायगढ़ के महाराजा चक्रधर सिंह ने श्नर्तन-सर्वस्वमश् और श्मुरजपरनपुष्पाकरश् जैसे ग्रंथों का सृजन किया, जिनमें दलबादल और गजविलास जैसी दुर्लभ बंदिशें हैं। लेख निष्कर्ष निकालता है कि वर्तमान में कथक नृत्य का नृत्तांग अपनी सौन्दर्य की पूर्णता को प्राप्त है।
Keywords :
नाट्यानुगामी नृत्य, मुखाभिनय, रायगढ़ दरबार, नृत्य में सरकने की क्रिया विधि, नृत्तांग में सौन्दर्यवृद्धि, सौन्दर्य बोधक प्रस्तुति, नृत्य के माध्यम से चारो दिशाओं को प्रणाम करना, चमत्कारिता पूर्ण बोलो का नृत्त्य में प्रयोग।