कथक की प्राचीन परम्परा के नृत्तांग में ताल पक्ष
Author : डॉ. जितेश गड़पायले
Abstract :
यह शोध पत्र कथक नृत्य शैली के नृत्तांग (शुद्ध, भावविहीन अंग संचालन) में ताल पक्ष की महत्ता पर केंद्रित है। कथक की परम्परा लगभग तीन हजार वर्ष पुरानी है। नृत्तांग को नृत्यकला का प्रथम रूप माना गया है, जिसका विकास ताण्डव और लास्य के उपरांत कुशीलव तथा चारण संज्ञक नटों द्वारा एक स्वतंत्र शैली के रूप में हुआ।
नृत्तांग, जिसका अर्थ है ताल और लय के अनुसार सौन्दर्यपूर्ण अंग संचालन, कथक प्रदर्शन का एक बड़ा हिस्सा होता है। कथक ताल प्रधान नृत्तांग के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें नर्तक उठान, ठाट, आमद, तोड़े-टुकड़े, परन, परमेलु व तत्कार का प्रदर्शन करते हैं, मुख्य रूप से त्रिताल में।
रायगढ़ के राजा चक्रधर सिंह ने ताल पक्ष को विशेष महत्व दियाय उन्होंने श्तालतोय निधिश् जैसे महाग्रंथ की रचना की, जिसमें 1 से 380 मात्रा तक की तालों का वर्णन है।
जयपुर घराने की कला में नृत्तांग का विकास तत्कार (पैरों का संचालन) के रूप में हुआ है। तत्कार को नृत्तांग का प्रथम और प्राणभूत तत्व माना जाता है। इसमें पैरों से ताल वाद्यों के बोलों की तरह लय, चाल और गतियों का प्रदर्शन किया जाता है। नृत्तांग की मौलिक विशेषता जटिल ताल पक्ष (छंद, लयें, बोल बंदिश, तत्कार) है, जो इसे अन्य शास्त्रीय नृत्यों से अलग करती है। इसकी विरल चपलता ही सहज लोकप्रियता का आधार है।
Keywords :
संस्कृति की धारा, पुरानी सुदीर्घ परम्परा, ताण्डव-लास्य कुशीलव चारण संज्ञक नटो का स्वतंत्र शैली के रूप में विकसित नृत्यकला।