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जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक नाटकों में राष्ट्र और नारी

Author : डॉ. बबिता के

Abstract :

हिन्दी नाट्‌य जगत में जयशंकर प्रसाद के प्रवेश से पविर्तन हुआ। नन्ददुलारे वाजपेयी के अनुसार प्रसाद ने इतिहास का बन्धन स्वीकार करते हुए भी ऐसे पात्रों और चरित्रों की योजना की जो शत प्रतिशत ऐतिहासिक नहीं है। नाटकीय पात्रों में व्यक्तित्व-स्थापन या चरित्र विक्रयण का यह यत्न हिन्दी नाटकों के विकास की ऐसी कड़ी है जो प्रसाद को असाधारण महत्य प्रदान करती है। हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु युग से लेकर प्रसाद युग तक नारी समस्याओं को लेकर अनेक रचनाएं हुई हैं। उन सबमें नारी को केवल समर्पण, त्याग, कर्तव्य, सेवा आदि भाव देकर कहीं-कहीं उसके गुणगान किया गया है। जैसे-प्रताप नारायण मिश्र ने कलिकौतुक नाटक में पतिव्रता हिन्दू नारी के बारे में लिखा है। अपने पति से कष्ट सहकर जीने वाली अबला के रूप में नारी का चित्रण किया गया है। राधाकृष्णदास की दुखिनी बाला, राधाचरण गोस्वामी के सती चन्द्रावती जैसे इस काल की जो भी रचना हों उसमें नारी केवल शोषण का शिकार बन जाती हैं। प्रसाद युग में आते-आते लेखन की दिशा में थोड़ा-सा बदलाव आ गया। लेकिन यह बदलाय तो सुधार का कोई सूचक नहीं रहा। स्त्री को आदर्श रूप देने की कोशिश ही प्रसाद ने किया। श्रीमती मुकुलरानी सिंह के अनुसार-भारतेन्दु युग में नारी के आंशिक उदात्त रूप देने की कोशिश ही प्रसाद ने किया। श्रीमती मुकुलरानी सिंह के अनुसार "भारतेन्दु युग में नारी के आशिक उदात्त गुणों एवं महानताओं का चित्रण अत्यन्त अल्प मात्रा में हो सका है। इसके मूल में देश की राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियां मुखर थी। भारतेन्दु युग एवं द्विवेदी युग के नाटककारों की रचनाओं में कहीं पर स्त्री का अलग एक स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं उभरकर आया है। कहीं-कहीं ऐसा दिखाया गया है कि नारी मुक्ति की कोशिश कर रहे हैंI” स्त्री की हालत क्यों नहीं बदली, इनका कारण क्या है? इसका कोई समाधान अभी तक नहीं निकला। लेकिन यह बात सच है कि इतिहास निर्माता के रूप में साहित्यकारों ने हमेशा पुरुष को ही माना है I

Keywords :

ऐतिहासिकता, राष्ट्र, नारी, अस्मिता बोध, दृष्टिकोण I