Download PDF

कल्याणकारी राज्य की अवधारणा और भारतः कार्ल मार्क्स और हेरोल्ड लास्की के परिप्रेक्ष्य में एक आलोचनात्मक अध्ययन

Author : सुशील कुमार बसवाल

Abstract :

यह शोध-पत्र कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का समग्र एवं आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें विशेष रूप से कार्ल मार्क्स और हेरोल्ड लास्की के वैचारिक दृष्टिकोणों को आधार बनाया गया है। अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि कल्याणकारी राज्य का उद्भव औद्योगिक क्रांति के पश्चात उत्पन्न सामाजिक, आर्थिक असमानताओं के परिप्रेक्ष्य में हुआ, जहाँ राज्य की भूमिका केवल शासकीय नियंत्रण तक सीमित न रहकर जनकल्याण के क्षेत्र में विस्तारित हुई। मार्क्स के अनुसार, राज्य वर्गीय शोषण का उपकरण है और कल्याणकारी नीतियाँ पूंजीवादी व्यवस्था को बनाए रखने का माध्यम हैं, जबकि लास्की राज्य को एक उत्तरदायी संस्था मानते हैं, जो सामाजिक न्याय, समानता और नागरिकों के समग्र विकास को सुनिश्चित करने में सक्षम है। इस प्रकार, शोध में इन दोनों विचारकों के दृष्टिकोणों के माध्यम से कल्याणकारी राज्य की वैचारिक संरचना और उसकी सीमाओं का गहन विश्लेषण किया गया है।
भारतीय संदर्भ में यह अध्ययन यह दर्शाता है कि संविधान द्वारा स्थापित आदर्शों, न्याय, स्वतंत्रता और समानता, के आधार पर भारत ने एक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना को अपनाया है, जिसका प्रतिबिंब विभिन्न नीतियों और योजनाओं में देखा जा सकता है। तथापि, व्यावहारिक स्तर पर इन नीतियों के क्रियान्वयन में अनेक चुनौतियाँकृजैसे असमानता, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता और संसाधनों का असमान वितरणकृइस अवधारणा की पूर्ण सफलता में बाधक बनती हैं। इस संदर्भ में कार्ल मार्क्स की आलोचनात्मक दृष्टि आंशिक रूप से प्रासंगिक सिद्ध होती है, जबकि हेरोल्ड लास्की का व्यावहारिक दृष्टिकोण राज्य की सकारात्मक भूमिका को रेखांकित करता है। निष्कर्षतः यह शोध इस बात पर बल देता है कि भारत में कल्याणकारी राज्य एक गतिशील और विकसित होती प्रक्रिया है जिसकी प्रभावशीलता के लिए पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और समावेशी विकास की दिशा में निरंतर सुधार आवश्यक हैं।
 

Keywords :

कल्याणकारी राज्य, सामाजिक न्याय, वर्ग संघर्ष, लोकतांत्रिक समाजवाद, भारतीय संविधान, आर्थिक असमानता, राज्य की भूमिका, समावेशी विकास।