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राजप्रशस्ति का ऐतिहासिक महत्व एवं स्त्रोत के रूप में उसका विश्लेषण

Author : डॉ. ललिता राठौड

Abstract :

राजप्रशस्ति राजस्थान के इतिहास का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्त्रोत मानी जाती है। यह शिलालेख मेवाड के महाराणा राजसिंह के शासन काल की राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थियों का वर्णन करता है। राजप्रशस्ति की रचना रणछोड भट्ट द्वारा संस्कृत भाषा में की गई थी।

ऐतिहासिक स्रोत के रूप में राजप्रशस्ति मेवाड़ के शासकों की वंशावली, उनके युद्धो धार्मिक नीतियो तथा प्रशासनिक कार्यों की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती है। इसके माध्यम से उस समय की संस्कृति समाज और धार्मिक आस्थाओं का भी जानकारी प्राप्त होता है।
यह भारत का सबसे बड़ा और सबसे लम्बा शिलालेख है, और राजसमन्द झील में नौ चैकियों के 25 स्तंभों के काले पत्थरों पर उकेरा गया। इसमें राजसमन्द झील का निर्माण अकाल राहत कार्यों के रूप मे किये जाने का वर्णन है।
प्रशस्ति में बापा रावल से लेकर राजसिंह तक मेवाड शासकों की ऐतिहासिह उपलाब्धिया राजसमन्द झील और बांध से जुड़े निर्माण कार्य, माप और लागत के विवरण के साथ-साथ किए गए अनुष्ठानों और अभिषेक समारोट पर चारणों और ब्राह्मणों को दान दिए जाने का विवरण प्रदान करता है यह काव्य 24 अध्यायों में विभाजित 1,106 संस्कृत श्लोकों से बना है।

Keywords :

राजप्रशस्ति, शिलालेख, राजसिंह, दान, वशांवली, युद्ध, निर्माण।