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समकालीन हिंदी कविता में बाजारवादी प्रवृत्तियों का चित्रण

Author : डॉ. ज्ञान प्रकाश यादव

Abstract :

आज बाजारवादी प्रवृत्तियों का अंधानुकरण आधुनिकता का पर्याय बन गया है। बाजार मानव-जीवन का नियामक बन कर उभर रहा है। मनुष्य के जीवन में बाजार की वजह से जो परिवर्तन आ रहा है, उसे समकालीन हिंदी कविता बखूबी रेखांकित करती है। प्रस्तुत शोध-आलेख में बाजारवादी प्रवृत्तियों के सामाजिक प्रभावों का अध्ययन किया गया है I

Keywords :

बाजार, बाजारवाद, बाजारवादी प्रवृत्तियाँ, पूंजीवाद, पूंजीवादी व्यवस्था, समकालीन हिंदी कविता, भूमंडलीकरण, साम्राज्यवाद, अंतर्राष्ट्रीय बाजार, विश्व बाजार आदि I