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वेदों में वनस्पति-पर्यावरण संतुलन मानव का उत्तरदायित्व

Author : विजय महावर

Abstract :

भारत में प्राचीनकाल से ही वनस्पतियों - पर्यावरण संतुलन मानव के उत्तरदायित्व का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। वैदिक युग में यद्यपि पर्यावरण दूषित होने का भय नहीं था, परन्तु इसके प्रति जागृति उस समय अवश्य थी। वैदिक युग में घर-घर में हवन होते थे, जिससे वातावरण शुद्ध रहता था, जनसंख्या थोड़ी थी तथा वन अधिक थे। अतः प्रदूषण की समस्या भी नहीं थी। वैदिक युग में जलवायु की शुद्धि का मुख्य साधन हवन था, जिसके द्वारा वातावरण की निश्चित रूप से शुद्धि होती थी। यज्ञ के लिए समर्पित ऋग्वेद के सूक्तों (1.36.3.8, 8.31, 10.13, 10.183) में यज्ञ द्वारा किये जाने वाले पर्यावरण शोधन की ओर संकेत ऋग्वेद में प्रभूत मात्रा में प्राप्त होता है। वनस्पति के लिए तो ऋग्वेद में अनेक सूक्त (1.90, 1.91, 10.97) प्राप्त होते हैं जिनमें वनस्पतियों व पर्यावरण संतुलन की महिमा एवं आवश्यकता की प्रचुर सूचना मिलती है। वानस्पत्य नामक सूक्त में वनस्पति को देवता माना गया है। प्रियस्तोगो वनस्पति (1.91.6) मधुयान्नौ वनस्पति (1.90.8) कहकर वनस्पति के जलवायु शोधक होने को प्रमाणित किया गया है I

Keywords :

वनस्पति, पर्यावरण, जलवायु, वैदिक युग, ऋग्वेद आदि I