बहुसंस्कृतिवाद की प्रमुख तत्व एवं धाराए
Author : डॉ. राजबहादुर कुशवाहा
Abstract :
विभिन्न सांस्कृतिक विविधता के लोगों को एक ही समाज में रहकर आपसी सद्भाव एवं सामाजिक संमजन का परिचय देना ही बहुसंस्कृतिवाद का मूल विचार है। चूंकि वैश्विक परिपे्रक्ष्य में व्यापक अन्तः देशीय प्रवासन से विभिन्न प्रकार के वैचारिक आयाम उपस्थित हुये थे, जिनमें कुछ मुख्य मूल बिन्दु थे, कि किस प्रकार की परिस्थितियों में विभिन्न नस्ल भाषा या धार्मिक विचार के व्यक्तियों के समूह को एक ही समाज में बिना किसी साम्प्रदायिक विभेद या अशांति फैलाये, एक स्थान पर केसे समेकित, किया जाये। इसका उत्तर विद्वानों एवं विचारकों द्वारा बहुसंस्कृतिवाद के रूप में दिया गया। बहुसंस्कृतिवाद को उदारवादी धारा में समाज में विविधता को मान्यता दी जाती है। यह लोकतंत्र को एकमात्र वैध राजनीतिक व्यवस्था मानती है। वही इसकी बहुलवादी विचारधारा का मानना है कि मनुष्यों में शारीरिक मानसिक समानता के बावजूद अपना निजी सांस्कृतिक अभिवृत्तियों व्यवहारों को मान्यता देनी चाहिये। बहुसंस्कृतिवादी विचारधारा का तीसरा मुख्य आधार कास्मोपोलिटनवाद है, जिसमें यह माना जाता है कि एक संस्कृति दूसरे से सीख सकती है दूसरे को कुछ दे सकती है। अतः यह पिक एण्ड मिक्स में विश्वास करती है। वस्तुतः यह कहना ज्यादा समीचीन होगा कि बहुसंस्कृतिवाद सार्वजनिक जीवन का ऐसा तथ्य बनता जा रहा है, जिसे उलट पाना संभव नहीं लगता। अब यह हम पर है कि हम इसे वरदान मान कर इसका उपभोग करें या अभिशाप समझकर रोदन करें। असल में हमारी व आगामी पीढी के लिये मुख्य वैचारिक मुद्दा ऐसे तरीकों की तलाश होगी जिसमें भिन्न-भिन्न संस्कृतियों, मूल्यों व धार्मिक परम्पराओं वाले लोग बिना संघर्ष व हिंसा के साथ-साथ रह सके।
Keywords :
वविधता, अल्पसंख्यक अधिकार, सांस्कृतिक अस्मिता, बहुसंस्कृतिवाद पाश्चात्य, समाज, उदारवादी आलोचना।