कथक नृत्य में तीन ताल का महत्च
Author : डॉ. जितेश गड़पायले
Abstract :
यह शोध पत्र कथक नृत्य में तीन ताल (त्रिताल) के महत्वपूर्ण उपयोग पर केंद्रित है। तीन ताल को प्राचीनकाल में खमसा ताल भी कहा जाता था। यह ताल विलम्बित, मध्य, द्रुत और अतिद्रुत सभी लयों में प्रयोग के लिए उपयुक्त है।
लेख में विशेष रूप से रायगढ़ शैली में तीन ताल के उपयोग और विकास का वर्णन है। राजा चक्रधर सिंह के दरबार में विभिन्न घरानों के गुणीजन (कथक, तबला, पखावज) थे, जिनके कारण तालपक्षों का बहुत विकास हुआ। रायगढ़ शैली में भावांग के साथ-साथ तालांग पर विशेष कार्य किया गया है।
रायगढ़ शैली में उठान, आमद, तोड़े, परन, तिहाईयां, और चक्करदार आदि रचनाएं पाँच प्रकार की लयों में प्रस्तुत की जाती हैं. लेख 16 मात्राओं में 16 बंदिशें प्रस्तुत करने की विशिष्ट फरमाईशी बंदिशों पर प्रकाश डालता है, जो कथक नर्तक के लिए एक कठिन प्रदर्शन है। लेख के अंत में बताया गया है कि कथक नृत्य की बंदिशें बिना लय या बोल बदले पाँचों तालों (तीन ताल, झपताल, पंचम सवारी, चोताल, एकताल) में एकसाथ श्समश् पर आती हैं, जो तालांग की विशेषता है।
Keywords :
प्राचीन कला के गुणी तीनताल को खमसा ताल भी कहते थे। सभी लय में प्रयोग के लिए यह काफी उपयुक्त ताल है। कथक नृत्य में तीन ताल का उपयोग मुख्य रूप से होता आ रहा है।